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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
सर्व लक्ष्मी पाने को उपदेश।
Word-Meaning: - (धृषितः) हारा हुआ शत्रु (धृषाणः=०−णस्य) हरानेवाले [इन्द्र] का (शवः) बल (न) नहीं (आधृषे=०−ष्टे) कुछ भी हराता है, (आ) कुछ भी (दधृषते) हराता है। (यथा) क्योंकि (व्यथिः) व्यथा में पड़ा हुआ शत्रु (पुरा) निकट होकर (इन्द्रस्य) बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष के (श्रवः) यश और (शवः) बल को (न) नहीं (आधृषे) कुछ भी हराता है ॥२॥
Connotation: - अधर्मी दुष्ट मनुष्य धर्म्मात्मा बलवानों को कदापि नहीं हरा सकते ॥२॥
Footnote: २−(न) निषेधे (आधृषे) धृष अभिभवे आदादित्वं छान्दसम्। लोपस्त आत्मनेपदेषु। पा० ७।१।४१। इति तलोपः। आधृष्टे। ईषद्धर्षयति अभिभवति (आ) ईषदर्थे, किञ्चित् (दधृषते) धर्षयति अभिभवति (धृषाणः) युधिबुधि०। उ० २।९०। इति धृष अभिवे−आनच् कित्। षष्ठ्यर्थे सुः। धृषाणस्य धर्षकस्य (धृषितः) अभिभूतः (शवः) बलम्−निघ० २।९। (पुरा) समीपे (यथा) यस्मात् (व्यथिः) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। इति व्यथ दुःखसंचलनयोः−इन्। दुःखितः (श्रवः) श्रूयमाणं यशः (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यवतो जीवस्य (न) (आधृषे) (शवः) ॥
