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आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः। पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्वः॑ ॥

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आ । अयम् । गौ: । पृश्नि: । अक्रमीत् । असदत् । मातरम् । पुर: । पितरम् । च । प्रऽयन् । स्व: ॥३१.१॥

Atharvaveda » Kand:6» Sukta:31» Paryayah:0» Mantra:1


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सूर्य वा भूमि के गुणों का उपदेश।

Word-Meaning: - (अयम्) यह (गौ) चलने वा चलानेवाला, (पृश्निः) रसों वा प्रकाश का छूनेवाला सूर्य (आ अक्रमीत्) घूमता हुआ है, (च) और (पितरम्) पालन करनेवाले (स्वः) आकाश में (प्रयन्) चलता हुआ (पुरः) सन्मुख हो कर (मातरम्) सब की बनानेवाली पृथिवी माता को (असदत्) व्यापा है ॥१॥
Connotation: - यह सूर्य अन्तरिक्ष में घूम कर आकर्षण, वृष्टि आदि व्यापारों से पृथ्वी आदि लोकों का उपकार करता है ॥१॥ इस सूक्त के तीनों मन्त्र कुछ भेद से अन्य तीनों वेदों में इस प्रकार हैं ॥ वेद पता ऋषि देवता ऋग्वेद १०।१८९।१-३ सार्पराज्ञी सार्पराज्ञी वा सूर्य्य यजुर्वेद ३।६-८ सार्पराज्ञी कद्रु अग्नि सामवेद पृ० ।१४।४-६ सार्पराज्ञी सूर्य्य हमनेसार्पराज्ञी चलनेवाले और चमकनेवाले सूर्य से सम्बन्धवाली पृथ्वी औरसूर्य को देवता मान कर सूक्त का अर्थ किया है। प्रत्येक मन्त्र के साथ महर्षि दयानन्दकृत भाष्य के अनुसार सक्षिप्त अर्थ दिखाया गया है, सविस्तार उनके भाष्य में देख लेवें ॥ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका−पृष्ठ १३६, पृथिव्यादिभ्रमण−“(अयम्) यह (गौः) पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा, अथवा अन्य लोक (पृश्निः=पृश्निम्) अन्तरिक्ष में (आ अक्रमीत्) घूमता चलता है, इनमें पृथिवी (मातरम्) अपने उत्पत्तिकारण जल को तथा (पितरम्) (स्वः) पिता और अग्निमय सूर्य को (असदत्) प्राप्त होती है (च) और (पुरः) पूर्व-पूर्व (प्रयन्) सूर्य के चारों ओर घूमती है। ऐसे ही सूर्य वायु पिता और आकाश माता के, तथा चन्द्रमा, अग्नि पिता और जल माता के प्रति घूमता है ॥ यजुर्वेद−अ० ३ म० ६ ॥ (अयम्) यह (गौः) गोलरूपी पृथिवी (पितरम्) पालन करनेवाले (स्वः) सूर्य के और (मातरम्) अपनी योनिरूप जल के (पुरः) आगे-आगे (प्रयन्) चलती हुई (पृश्निः) अन्तरिक्ष अर्थात् आकाश में (आ अक्रमीत्) चारों ओर चलती है (च) और (असदत्) अपनी कक्षा में घूमती है ॥ यह पृथ्वी अपने योनिरूप जलसहित आकर्षण करनेवाले सूर्य के चारों ओर घूमती है, उसी से दिनरात्रि, शुक्ल कृष्णपक्ष और ऋतु और अयन आदि काल विभाग उत्पन्न होते हैं ॥
Footnote: १−(अयम्) प्रत्यक्षः (गौः) अ० १।२।३। गौरादित्यो भवति। गमयति रसान्, गच्छत्यन्तरिक्षे−निरु० २।१४। (पृश्निः) अ० २।१।१। स्पृश−नि। पृश्निरादित्यो भवति.... संस्प्रष्टा रसान् संस्प्रष्टा भासं ज्योतिषां संस्पृष्टो भासेति वा−निरु० २।१४। (आ अक्रमीत्) समन्तात् क्रान्तवान् (असदत्) असीदत्। प्राप्तवान् (मातरम्) निर्मात्रीं भूमिम् (पुरः) पुरस्तात्। अग्रे (पितरम्) पालकम् (च) समुच्चये (प्रयन्) इण्−शतृ। सञ्चरन् (स्वः) अ० २।५।२। अन्तरिक्षलोकम् ॥