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अव॑ मा पाप्मन्त्सृज व॒शी सन्मृ॑डयासि नः। आ मा॑ भ॒द्रस्य॑ लो॒के पाप्म॑न्धे॒ह्यवि॑ह्रुतम् ॥

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Pad Path

अव । मा । पाप्मन् । सृज । वशी । सन् । मृडयासि । न: । आ । मा । भद्रस्य । लोके । पाप्मन् । धेहि । अविऽह्रुतम् ॥२६.१॥

Atharvaveda » Kand:6» Sukta:26» Paryayah:0» Mantra:1


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

कष्ट त्यागने के लिये उपदेश।

Word-Meaning: - (पाप्मन्) हे पापी विघ्न ! (मा) मुझे (अव सृज) छोड़ दे और (वशी) वश में पड़नेवाला (सन्) होकर तू (नः) हमें (मृडयासि) सुख दे (पाप्मन्) हे पापी विघ्न ! (भद्रस्य) आनन्द के (लोके) लोक में (मा) मुझे (अविह्रुतम्) पीड़ा रहित (आ) अच्छे प्रकार (धेहि) रख ॥१॥
Connotation: - जो मनुष्य पुरुषार्थ से विघ्नों को हटाते हैं, वे आनन्द पाते हैं ॥१॥
Footnote: १−(मा) माम् (पाप्मन्) अ० ३।३१।१। हे दुःखप्रद विघ्न (अव सृज) विमोचय (वशी) अ० १।२१।१। आयत्तः (सन्) (मृडयासि) अ० ५।२२।९। सुखयेः (नः) अस्मान् (आ) समन्तात् (मा) माम् (भद्रस्य) कल्याणस्य (लोके) स्थाने (धेहि) स्थापय (अविह्रुतम्) ह्रु ह्वरेश्छन्दसि। पा० ७।२।३१। इति ह्वृ कौटिल्ये निष्ठायां ह्रुभावः। अपीडितम् ॥