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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ईश्वर के गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (सिन्धुपत्नीः) बहनेवाले संसार [वा समुद्र] की पालनेवाली, (सिन्धुराज्ञीः) बहनेवाले जगत् की शासन करनेवाली, [वा समुद्र की शोभा बढ़ानेवाली] (याः) जो तुम (सर्वाः) सब शक्तियाँ (नद्यः) [परमेश्वर की] स्तुति करनेवाली [वा नदियाँ] (स्थन) हो। वे तुम (नः) हमें (तस्य) हिंसक रोग की (भेषजम्) ओषधि (दत्त) दो, (तेन) उससे (वः) तुम्हारे [गुणों को] (भुनजामहै) हम भोगें ॥३॥
Connotation: - जिस परमेश्वर ने मनुष्य के सुख के लिये अनन्त रचनायें की हैं, उसकी उपासना करके मनुष्य सदा शान्ति पावें और जल द्वारा रोगनिवृत्ति करें ॥३॥
Footnote: ३−(सिन्धुपत्नीः) विभाषा सपूर्वस्य। पा० ४।१।३४। इति ङीप् नकारौ। सिन्धौः स्यन्दनशीलस्य संसारस्य समुद्रस्य वा पत्न्यः पालयित्र्यः (सिन्धुराज्ञीः) सिन्धोः स्यन्दशीलस्य जगतो राज्ञः शासिकाः, यद्वा समुद्रस्य राजयित्र्यः शोभयित्र्यः (सर्वाः) (याः) (नद्यः) णद भाषायां चुरा०−अच्, नदतेः स्तुतिकर्मणः−निरु० ५।२। स्त्रोत्र्यः परमेश्वरस्य जलप्रवाहाः (स्थन) तप्तनप्तनथनाश्च। पा० ७।१। भवथ (दत्त) प्रयच्छत (नः) अस्मभ्यम् (तस्य) तर्द हिंसायाम्। रोगस्य (भेषजम्) औषधम् (तेन) (वः) युष्माकं गुणान् (भुनजामहै) भुज पालनाभ्यवहारयोः। भुजोऽनवने। पा० १।३।६६। इत्यात्मनेपदम्। उपजीवाम ॥
