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यथा॒ भूमि॑र्मृ॒तम॑ना मृ॒तान्मृ॒तम॑नस्तरा। यथो॒त म॒म्रुषो॒ मन॑ ए॒वेर्ष्योर्मृ॒तं मनः॑ ॥

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Pad Path

यथा । भूमि: । मृतऽमना: । मृतात् । मृतमन:ऽतरा । यथा । उत । मम्रुष: । मन: । एव । ईर्ष्यो: । मृतम् । मन: ॥१८.२॥

Atharvaveda » Kand:6» Sukta:18» Paryayah:0» Mantra:2


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

ईर्ष्या के निवारण का उपदेश।

Word-Meaning: - (यथा) जैसे (भूमिः) भूमि (मृतमनाः) मरे मनवाली [ऊसर] होकर (मृतात्) मरे से भी (मृतमनस्तरा) अधिक मरे मनवाली है। (उत) और (यथा) जैसे (मम्रुषः) मरे हुए मनुष्य का (मनः) मन है (एव) वैसे ही (ईर्ष्योः) डाह करनेवाले का (मनः) मन (मृतम्) मरा होता है ॥२॥
Connotation: - जैसे भूमि ऊसर हो जाने से उपजाऊ नहीं रहती और जैसे मृतक प्राणी का मन कुछ नहीं कर सकता, वैसे ही डाह करनेवाला जल-भुन कर उद्योगहीन हो जाता है ॥२॥
Footnote: २−(यथा) येन प्रकारेण (भूमिः) सर्वप्राणिभिरधिष्ठिता पृथिवी (मृतमनाः) उत्पादनशक्तिहीना। ऊषरा (मृतात्) त्यक्तप्राणात्। मृतकात् (मृतमनस्तरा) अधिकमृतमना (उत) अपि च (मम्रुषः) मृङ् प्राणत्यागे−क्वसु। मृतवतः पुरुषस्य (मनः) मनोबलम् (एव) एवमेव (ईर्ष्योः) भृमृशीङ्०। उ० १।६। इति ईर्ष्य−उ। ईर्षायुक्तस्य पुरुषस्य (मृतम्) विनष्टं भवति (मनः) ॥