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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
गर्भाधान का उपदेश।
Word-Meaning: - (यथा) जैसे (इयम्) इस (मही) बड़ी (पृथिवी) पृथिवी ने (भूतानाम्) पञ्च महाभूतों के (गर्भम्) गर्भ को (आदधे) यथावत् धारण किया है, (एव) वैसे ही (ते) (गर्भः) गर्भ (सूतुम्) संतान को (अनु) अनुकूलता से (सवितवे) उत्पन्न करने के लिये (ध्रियताम्) स्थिर होवे ॥१॥
Connotation: - जैसे पृथिवी बीज को अपने में धारण करके अनुकूल समय पर उत्पन्न करती है, वैसे ही प्रयत्न किया जावे कि संतान गर्भ से पूरे दिनों में उत्पन्न होकर बली और पराक्रमी होवे, ऐसा ही भावार्थ आगे समझो ॥१॥ यह सूक्त स्वामी दयानन्द कृत संस्कारविधि में गर्भाधानप्रकरण में आया है ॥
Footnote: १−(यथा) येन प्रकारेण (इयम्) परिदृश्यमाना (पृथिवी) (मही) विशाला (भूतानाम्) पृथिव्यादिपञ्चभूतानाम् (गर्भम्) अ० ३।१०।१२। स्तुत्यं बालकम् (आदधे) सम्यम् धृतवती (एव) एवम् (ते) तव (ध्रियताम्) गर्भाशये धृतः स्थिरो भवतु (गर्भः) (अनु) आनुकूल्येन (सूतुम्) पः किच्च। उ० १।७१। इति षूङ् प्राणिगर्भविमोचने−तुन् कित्। सूनुं संतानम् (सवितवे) षूङ्−तुमर्थे तवे प्रत्ययः। प्रसवितुं प्रजनयितुम् ॥
