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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
रोग के नाश का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे वैद्य !] (अस्थिस्रंसम्) हड्डियाँ गला देनेवाले, (परुस्रंसम्) जोड़ों के ढीला कर देनेवाले (आस्थितम्) स्थिर (हृदयामयम्) हृदयरोग, अर्थात् (सर्वम्) सब (बलासम्) बल गिरा देनेवाले क्षयरोग [खाँसी, कफ़ आदि] को (नाशय) नाश करदे, (यः) जो (अङ्गेष्ठाः) अङ्ग-अङ्ग में बैठा हुआ (च) और (पर्वसु) सब जोड़ों में है ॥१॥
Connotation: - जैसे वैद्य ओषधि द्वारा रोगों का नाश करता है, वैसे ही मनुष्य विद्या द्वारा अविद्या का नाश करें ॥१॥
Footnote: १−(अस्थिस्रंसम्) स्रंसु पतने−पचाद्यच्। अस्थ्नां स्रंसः स्रंसनं पतनं यस्मात् तं रोगम् (परुस्रंसम्) परुषां पर्वणां शरीरसन्धीनां पतनं यस्मात् तम् (आस्थितम्) समन्ताद् व्याप्य स्थितम् (हृदयामयम्) हृद्रोगम् (बलासम्) अ० ४।९।८। बलस्य असितारं कासकफादिक्षयरोगम् (सर्वम्) निःशेषम् (नाशय) उन्मूलय (अङ्गेष्ठाः) अङ्गे+ष्ठा−विच्। हस्तपादाद्यङ्गेषु स्थितः (यः) (बलासः) (च) (पर्वसु) शरीरसन्धिषु वर्तते ॥
