Go To Mantra

वि जि॑हीष्व लो॒कं कृ॑णु ब॒न्धान्मु॑ञ्चासि॒ बद्ध॑कम्। योन्या॑ इव॒ प्रच्यु॑तो॒ गर्भः॑ प॒थः सर्वाँ॒ अनु॑ क्षिय ॥

Mantra Audio
Pad Path

वि । जिहीष्व । लोकम् । कृणु । बन्धात् । मुञ्चासि । बध्दकम् । योन्या:ऽइव । प्रऽच्युत: । गर्भ: । पथ: । सर्वान् । अनु । क्षिय ॥१२१.४॥

Atharvaveda » Kand:6» Sukta:121» Paryayah:0» Mantra:4


Reads 66 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

मोक्ष पाने का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे पुरुष !] (वि जिहीष्व) विविध प्रकार से चल, (लोकम्) समाज को (कृणु) बना, (बद्धकम्) बड़े बँधुवे (आत्मा) को (बन्धात्) बन्ध से (मुञ्चासि) तू छुड़ा दे (योन्याः) गर्भाशय से (प्रच्युतः) बाहर निकले हुए (गर्भः इव) बालक के समान (सर्वान्) सब (पथः अनु) मार्गों की ओर (क्षिय) चल ॥४॥
Connotation: - मनुष्य जैसे-जैसे प्रयत्न करता है, वैसे-वैसे दुःखबन्धन से छूट कर आनन्द भोगता है, जैसे गौ आदि का बच्चा गर्भ से उत्पन्न होकर प्रसन्नता से विचरता है ॥४॥
Footnote: ४−(वि) विविधम् (जिहीष्व) ओहाङ् गतौ। गच्छ (लोकम्) स्थानम्। समाजम् (कृणु) कुरु (बन्धात्) दुःखबन्धनात् (मुञ्चासि) लेटि रूपम्। विमोचय (बद्धकम्) कुत्सितबन्धं गतम् (योन्याः) गर्भाशयात् (इव) यथा (प्रच्युतः) बहिर्निगतः (गर्भ) बालकः (पथः) मार्गान् (सर्वान्) समस्तान् (अनु) अनुलक्ष्य (क्षिय) क्षि निवासगत्योः। गच्छ ॥