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प्र॒जाप॑ति॒रनु॑मतिः सिनीवा॒ल्य॑चीक्लृपत्। स्त्रैषू॑यम॒न्यत्र॒ दध॒त्पुमां॑समु दधदि॒ह ॥

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Pad Path

प्रजाऽपति: । अनुऽमति: । सिनीवाली । अचीक्लृपत् । स्रैसूयम् । अन्यत्र । दधत् । पुमांसम्। ऊं इति । दधत्। इह ॥११.३॥

Atharvaveda » Kand:6» Sukta:11» Paryayah:0» Mantra:3


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

गर्भाधान का उपदेश।

Word-Meaning: - (अनुमतिः) अनुकूल बुद्धिवाली, (सिनीवाली) अन्नवाली (प्रजापतिः) प्रजापालक शक्ति परमेश्वर ने (अचीक्लृपत्) यह शक्ति दी है। (अन्यत्र) दूसरे प्रकार में [स्त्री का रज अधिक होने में] (स्त्रैषूयम्) स्त्रीजन्मसंबन्धी क्रिया (दधत्=दधते) वह [ईश्वर] धारण करता है और (इह) इसमें [पुरुष का वीर्य अधिक होने पर] (उ) निश्चय करके (पुमांसम्) बलवान् संतान को (दधत्) वह स्थापित करता है ॥३॥
Connotation: - मनुष्य उत्तम बुद्धिवाला, अन्नवान् और प्रजापालक होकर ईश्वरनियम से गृहस्थ आश्रम के योग्य होता है और स्त्री का रज अधिक होने पर कन्या और पुरुष का वीर्य अधिक होने पर पुरुषसन्तान उत्पन्न होता है ॥३॥
Footnote: ३−(प्रजापतिः) प्रजापालिका शक्तिः परमेश्वरः (अनुमतिः) अनुकूलबुद्धियुक्ता (सिनीवाली) अ० २।२६।२। अन्नधर्त्री। अन्नवती (अचीक्लृपत्) कृपू सामर्थ्ये ण्यन्ताल्लुङि चङि रूपम्। समर्थमकरोत् (स्त्रैषूयम्) राजसूयसूर्य० पा० ३।१।११४। इति स्त्री+षूङ् प्रसवे−क्यप्। स्त्रीसूय−अण् सम्बन्धे। कन्याजन्मसम्बन्धि कर्म (अन्यत्र) अन्यप्रकारे। स्त्रीरजआधिक्ये (दधत्) दध धारणे−लडर्थे लेट् परस्मैपदं च छान्दसम्। ईश्वरो दधते स्थापयति (पुमांसम्) पुरुषसन्तानम् (उ) अवश्यम् (दधत्) (इह) अस्मिन्विधौ। पुरुषवीर्याधिक्ये ॥