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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
गर्भाधान का उपदेश।
Word-Meaning: - (अश्वत्थः) बलवानों में ठहरनेवाला पुरुष (शमीम्) शान्तस्वभाव स्त्री के प्रति (आरूढः) आरूढ हो चुकता है, (तत्र) उस काल में (पुंसुवनम्) सन्तान का उत्पत्तिकर्म (कृतम्) किया जाता है। (तत्) वह कर्म (वै) हा (पुत्रस्य) कुलशोधक संतान की (वेदनम्) प्राप्ति का कारण है, (तत्) उस कर्म को (स्त्रीषु) स्त्रियों में (आभरामसि) हम पहुँचाते हैं ॥१॥
Connotation: - वीर्यवान् पति और शान्तस्वभाव पत्नी यथाविधि परस्पर संयोग करके सन्तान उत्पन्न करें ॥१॥ इस सूक्त का विधान पुंसवनसंस्कार में भी दयानन्दकृत संस्कारविधि में है ॥
Footnote: १−(शमीम्) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। इति शम उपशमे−इन्, ङीप्। शमी कर्मनाम−निरु० २।१। शान्तस्वभावां स्त्रियम् (अश्वत्थः) अ० ३।६।१। अश्वेषु बलवत्सु तिष्ठतीति सः। अतिवीरपुरुषः (आरूढः) अधिगतः (तत्र) तस्मिन् काले (पुम् सुवनम्) भूसूधू०। उ० २।८०। इति षूङ् प्रसवे−क्युन्। पुंसो रक्षकस्य सन्तानस्योत्पादनम् (कृतम्) विहितम् (तत्) पुंसवनम् (पुत्रस्य) कुलशोधकस्य सन्तानस्य (वेदनम्) विद्लृ लाभे−ल्युट्। लाभकारणम् (तत्) कर्म (स्त्रीषु) पत्नीषु (आभरामसि) आ हरामः। प्रापयामः ॥
