Go To Mantra
Viewed 148 times

विश्व॑जित्त्रायमा॒णायै॑ मा॒ परि॑ देहि। त्राय॑माणे द्वि॒पाच्च॒ सर्वं॑ नो॒ रक्ष॒ चतु॑ष्पा॒द्यच्च॑ नः॒ स्वम् ॥

Mantra Audio
Pad Path

विश्वऽजित् । त्रायमाणायै । मा । परि । देहि । त्रायमाणे । द्विऽपात् । च । सर्वम् । न: । रक्ष । चतु:ऽपात् । यत् । च । न: । स्वम् ॥१०७.१॥

Atharvaveda » Kand:6» Sukta:107» Paryayah:0» Mantra:1


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सब सुख की प्राप्ति के लिये उपदेश।

Word-Meaning: - (विश्वजित्) हे संसार के जीतनेवाले परमेश्वर ! (त्रायमाणायै) त्रायमाणा, रक्षा करनेवाली [शाला वा ओषधि विशेष] को (मा) मुझे (परि देहि) सौंप। (त्रायमाणे) हे रक्षा करनेवाली शाला ! (नः) हमारे (सर्वम्) सब (द्विपात्) दो पाये (च) और (चतुष्पात्) चौपाये (च) और (नः) हमारे (यत् स्वम्) सब कुछ धन की (रक्ष) रक्षा कर ॥१॥
Connotation: - मनुष्य परमेश्वर के दिये सामर्थ्य से दृढ़स्थान बनाकर और त्रायमाणा आदि औषध का सेवन करके मनुष्यों, पशुओं और धन की सर्वथा रक्षा करे ॥१॥ इस मन्त्र में (शाला) शब्द की अनुवृत्ति गत मन्त्र ३ से आती है, और (त्रायमाणा) ओषधि विशेष भी है, जिसके नाम त्रायन्ती, बलभद्रिका आदि हैं ॥
Footnote: १−(विश्वजित्) हे जगद्विजयिन् परमेश्वर (त्रायमाणायै) त्रैङ् पालने−शानच्। रक्षाशीलायै शालायै ओषधिविशेषायै वा (मा) माम् (परि देहि) समर्पय (त्रायमाणे) हे रक्षाशीले (द्विपात्) पादद्वयोपेतं मनुष्यादिकम् (सर्वम्) अखिलम् (नः) अस्माकम् (रक्ष) पालय (चतुष्पात्) गोमहिषादिकम् (यत्) यत्किञ्चित्सर्वम् (स्वम्) धनम् ॥