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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
जितेन्द्रिय होने का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे प्राणी !] (अहम्) मैं (ते मनः) तेरे मन को (आखिदामि) ऐसे खीचता हूँ (इव) जैसे (राजाश्वः) बड़ा अश्ववार (पृष्ट्याम्) बागडोर को। (मयि) मुझ में (ते मनः) तेरा मन (वेष्टताम्) लिपटा रहे (यथा) जैसे (रेष्मच्छिन्नम्) व्याकुल करनेवाली आँधी से तोड़ा गया (तृणम्) घास ॥२॥
Connotation: - मनुष्य अपने मन को कुविषयों से खींच कर तत्त्व विचार में ऐसा लगावे, जैसा सुसारथी चञ्चल घोड़े को बागडोरी से वश में करता है, अथवा जैसे घास आँधी से टूट कर आँधी के वश में हो जाती है ॥२॥
Footnote: २−(अहम्) जितेन्द्रियः (आखिदामि) आकर्षामि (ते) तव (मनः) अन्तःकरणम् (राजाश्वः) अश्वमारोहतीति अश्वारूढः, स एव अश्वः। विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वक्तव्यः। वा० पा० ५।३।८३। इत्यारूढपदलोपः राजाश्वारूढः=राजाश्वः, कुशलोऽश्वारूढः (पृष्ट्याम्) पृषु सेचनहिंसासंक्लेशनेषु−क्तिन्, ततो यत्। पृष्टौ क्लेशसाधनाया रज्ज्वां भवरश्मिप्रग्रहम् (इव) यथा (रेष्मच्छिन्नम्) रिष हिंसायाम्−मनिन्। रेषकेण तीव्रवायुना भग्नम् (यथा) येन प्रकारेण (मयि) मम वशे (ते) तव (वेष्टताम्) आच्छाद्यताम् (मनः) ॥
