PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये उपदेश।
Word-Meaning: - (आथर्वण) हे निश्चल ब्रह्म के जाननेवाले महर्षि ! (देवम्) प्रकाशस्वरूप (सवितारम्) सब के प्रेरक परमात्मा को (दोषो) रात्रि में भी (गाय) गा, (बृहत्) विशाल रूप से (गाय) गा, (द्युमत्) स्पष्ट रीति से (धेहि) धारण कर और (स्तुहि) बड़ाई कर ॥१॥
Connotation: - विद्वान् पुरुष परमेश्वर के गुणों को हृदय में धारण करके संसार में सदा प्रकाशित करे ॥१॥
Footnote: १−(दोषो) दोषा+उ। रात्रावपि। अहोरात्रे, इत्यर्थः (गाय) उच्चारय (बृहत्) विशालरूपेण (गाय) (द्युमत्) यथा तथा, प्रकाशेन (धेहि) धारय हृदये (आथर्वण) अथर्वा व्याख्यातः−अ० ४।१।७। तदधीते तद्वेद। पा० ४।२।५९। इति अर्थवन्−अण्। अन्। पा० ६।४।६७। इति टिलोपाभावः। अथर्वाणं निश्चलस्वभावं परमात्मानं यो महर्षिर्वेद जानाति तत्सम्बुद्धौ (स्तुहि) प्रशंस (देवम्) प्रकाशस्वरूपम् (सवितारम्) षू प्रेरणे−तृच्। सर्वप्रेरकं जगदीश्वरम् ॥
