Reads 56 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
राजा के धर्म का उपदेश।
Word-Meaning: - (वैकङ्कतेन) विज्ञानसम्बन्धी (इध्मेन) प्रकाश के साथ (देवेभ्यः) व्यवहारकुशल पुरुषों को (आज्यम्) पाने योग्य वस्तु (वह) पहुँचा। (अग्ने) हे अग्निसमान तेजस्वी राजन् ! (तान्) उन लोगों को (इह) यहाँ पर (मादय) प्रसन्न कर। (सर्वे) वे सब (मे) मेरी (हवम्) पुकार को (आ यन्तु) आकर प्राप्त हों ॥१॥
Connotation: - राजा अनेक विद्याओं का प्रचार करके विद्वानों का सत्कार करे, जिस से प्रजा में दुःख लेशमात्र न रहे ॥१॥
Footnote: १−(वैकङ्कतेन) भृमृदृशि०। उ० ३।१०१। इति विपूर्वात् ककि गतौ−अतच्, ततः अण्। विज्ञानेन सम्बन्धिना। वैज्ञानिकेन (इध्मेन) इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। इति ञिइन्धी दीप्तौ−मक्। प्रकाशेन (देवेभ्यः) व्यवहारकुशलेभ्यः (आज्यम्) आङ् पूर्वादञ्जेः संज्ञायामुपसंख्यानम्। वा० पा० ३।१।१०९। इति आङ्+अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु−क्यप्। अनिदितां हल०। पा० ६।१।२४। इति नस्य लोपः। व्यक्तीकरणीयं प्रकाशनीयम्। गम्यं प्राप्यं वस्तु (वह) प्रापय (अग्ने) हे अग्निवत्तेजस्विन् राजन् (तान्) देवान् (इह) अस्मिन् देशे (मादय) हर्षय (सर्वे) देवाः (आ यन्तु) आगच्छन्तु (मे) मम (हवम्) आह्वानम् ॥
