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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
पुरुषार्थ करने के लिये उपदेश।
Word-Meaning: - (अराते) हे अदान शक्ति ! (यम्) जिस (परिरापिणम्) बड़बड़िया (पुरुषम्) पुरुष को (पुरोधत्से) तू आगे धरती है। (ते) तेरे (तस्मै) उस पुरुष को (नमः) नमस्कार (कृण्मः) हम करते हैं, (मम) मेरी (वनिम्) भक्ति को (मा व्यथयीः) तू व्यथा में मत डाल ॥२॥
Connotation: - वीर मनुष्य विपत्तिग्रस्त पुरुषों को उत्साहपूर्वक विपत्ति से निकालें ॥२॥
Footnote: २−(यम्) पुरुषम् (अराते) म० १। हे अदानशक्ते (पुरोधत्से) अग्रे धरसि (पुरुषम्) मनुष्यम् (परिरापिणम्) रप व्यक्तायां वाचि-णिनि। परिभाषणशीलम् (नमः) सत्कारः (ते) तव (तस्मै) पुरुषाय (कृण्मः) कृवि करणे। कुर्मः (वनिम्) खनिकष्यज्यसिवसिवनि०। उ० ४।१४०। इति वन सभक्तौ−इ। भक्तिम् (मा व्यथयीः) व्यथ भयसंचलनयोः−णिचि लुङि छान्दसं रूपम्। मा विव्यथः। मा व्यथय ॥
