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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
Word-Meaning: - (हिरण्यवर्णे) हे तेजःस्वरूपिणी ! (सुभगे) हे बड़े ऐश्वर्यवाली ! (शुष्मे) हे महाबलवाली ! (लोमशवक्षणे) हे छेदनशीलों पर रोषवाली ! (लाक्षे) हे दर्शनीयशक्ति परमात्मन् ! तू (अपाम्) व्यापक प्रजाओं की (स्वसा) अच्छे प्रकार प्रकाश करनेहारी (असि) है। (ते) तेरा (आत्मा) आत्मा (ह) निश्चय करके (वातः) व्यापक (बभूव) हुआ है ॥७॥
Connotation: - महाधनी सर्वशक्तिमान् सर्वजनक परमेश्वर दुष्टों पर क्रोध करता है, इस से हम सदा उत्तम कर्म करते रहें ॥७॥ लोक में (लाक्षासूक्तम्) लाख वा लाह को भी कहते हैं ॥
Footnote: ७−(हिरण्यवर्णे) हे तेजःस्वरूपे (सुभगे) हे शोभनैश्वर्ययुक्ते (शुष्मे) शुष्मं बलम्−२।९। अर्शआद्यच्। हे बलवति (लोमशवक्षणे) नामन्सीमन्व्योमन्लोमन्०। उ० ४।१५१। इति लूञ् छेदने−मनिन्। लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः। पा० ५।२।१००। इति लोम−श, मत्वर्थे। वक्ष रोषे−ल्युट्। हे लोमशेषु छेदनस्वभावेषु रोषशीले (अपाम्) व्याप्तानां प्रजानाम् (असि) (स्वसा) म० १। सुष्ठु दीपयित्री, (लाक्षे) गुरोश्च हलः। पा० ३।३।१०३। इति लक्ष दर्शनाङ्कनयोरालोचने च−अ, टाप्, पृषोदरादित्वाद्वृद्धिः। हे दर्शनीये शक्ते परमात्मन् (वातः) व्यापकः (ह) निश्चयेन (आत्मा) स्वरूपम् (बभूव) (ते) तव ॥
