रक्षा और ऐश्वर्य का उपदेश।
Word-Meaning: - वह [परमेश्वर] (नव) नौ (प्राणान्) जीवनशक्तियों को (नवभिः) नौ [इन्द्रियों] के साथ (शतशारदाय) सौ शरद् ऋतुओंवाले (दीर्घायुत्वाय) दीर्घ जीवन के लिये (सं मिमीते) यथावत् मिलाता है। [उसी करके] (हरिते) दरिद्रता हरनेवाले पुरुषार्थ में (त्रीणि) तीनों, (रजते) प्रिय होनेवाले प्रबन्ध [वा रूप्य] में (त्रीणि) तीनों, और (अयसि) प्राप्त योग्य कर्म [वा सुवर्ण] में (त्रीणि) तीनों [सुख] (तपसा) सामर्थ्य से (आविष्ठितानि) स्थित किये गये हैं ॥१॥
Connotation: - जिस परमात्मा ने नवद्वारपुर शरीर में दोनों कानों, दोनों नेत्रों, दोनों नथनों, मुख, पायु और उपस्थ, नव इन्द्रियों में नव शक्तियाँ रक्खी हैं, उसी जगदीश्वर ने बताया है कि मनुष्य उत्तम पुरुषार्थ, उत्तम प्रबन्ध और उत्तम कर्म से चाँदी सोना एकत्र करके तीन सुख अर्थात् अन्न, मनुष्य और पशुओं को बढ़ावे−मन्त्र ३ देखो ॥१॥