Reads 66 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
पुरुषार्थ का उपदेश।
Word-Meaning: - (सः) वह (अग्निः) विद्वान् पुरुष (अध्वरेषु) सन्मार्गवाले (प्रयक्षु) बड़े यज्ञों वा समाजों में (अस्य) इस (अग्नेः) सर्वव्यापक परमेश्वर की (स्रुचः) गति की (महिमानम्) महिमा को (यक्षत्) पूजे ॥५॥
Connotation: - विद्वान् पुरुष संसार में परमात्मा की विचित्र गति को जान कर पुरुषार्थ करता है ॥५॥
Footnote: ५−(अग्निः) विद्वान् पुरुषः (स्रुचः) चिक् च। उ० २।६२। इति स्रु गतौ−चिक्। गतेः (अध्वरेषु) अ० ३।१६।६। अध्वन्−रो मत्वर्थीयः। सन्मार्गवत्सु (प्रयक्षु) प्र+यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु−विच्। प्रयागेषु। प्रकृष्टसमाजेषु (सः) विद्वान् (यक्षत्) अ० ३।४।६। यजेर्लेटि रूपम्। यजेत्। सत्कुर्यात् (अस्य) प्रसिद्धस्य (महिमानम्) महत्त्वम् (अग्नेः) सर्वव्यापकस्य परमेश्वरस्य ॥
