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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
पुरुषार्थ का उपदेश।
Word-Meaning: - (नराशंसः) मनुष्यों में प्रशंसावाला, (सुकृत्) उत्तम कर्म करनेवाला, (देवः) व्यवहार में चतुर, (सविता) ऐश्वर्यवाला (विश्ववारः) सब से अङ्गीकार करने योग्य (अग्निः) विद्वान् पुरुष (मध्वा) ज्ञान से (यज्ञम्) समाज को (प्रैणानः) आगे बढ़ाता हुआ (नक्षति) चलता है ॥३॥
Connotation: - विद्वान् पुरुषार्थी मनुष्य विद्याबल से संसार की उन्नति करता है ॥३॥ प्रैणानः) पद के स्थान पर यजुर्वेद। २७।१३। में [प्रीणानः] है ॥
Footnote: ३−(मध्वा) म० २। ज्ञानेन (यज्ञम्) समाजम् (नक्षति) गच्छति (प्रैणानः) प्रैणृ गतिप्रेरणश्लेषणेषु−शानच्, आत्मनेपदं छान्दसम्। प्रेरयन् (नराशंसः) नर+आङ्+शंसु स्तुतौ−अ, टाप्। नरेषु आशंसा प्रशंसा यस्य सः। नराशंसो यज्ञ इति कात्थक्यो नरा अस्मिन्नासीनाः शंसन्ति। अग्निरिति शाकपूणिर्नरैः प्रशस्यो भवति−निरु० ८।६। (अग्निः) विद्वान् पुरुषः (सुकृत्) सुकर्मा (देवः) व्यवहर्ता (सविता) षु प्रसवैश्वर्ययोः−तृच्, अदा० सेट्। ऐश्वर्यवान् (विश्ववारः) विश्व+वृञ् वरणे−घञ्। सर्वैर्वरणीयः स्वीकरणीयः ॥
