Devata: इळा, सरस्वती, भारती
Rishi: ब्रह्मा
Chhanda: षट्पदानुष्टुब्गर्भा परातिजगती
Swara: अग्नि सूक्त
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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
पुरुषार्थ का उपदेश।
Word-Meaning: - (वनस्पते) हे सेवनीय शास्त्र के रक्षक (रराणः) दानशील तू (अव सृज) दान कर। (शमिता) शान्ति करनेवाला (अग्निः) विद्वान् पुरुष (त्मना) आत्मबल से (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (हव्यम्) ग्राह्यपदार्थ अन्न आदि को (स्वादयतु) स्वादु बनावे ॥११॥
Connotation: - विद्वान् पुरुष विद्वानों का सत्कार करके विद्या आदि उत्तम गुणों की वृद्धि करे ॥११॥
Footnote: ११−(वनस्पते) वनस्य सम्भजनीयस्य शास्त्रस्य पालकः−इति दयानन्दभाष्ये, यजु० २७।२१। (अव सृज) दानं कुरु (रराणः) रा दाने−कानच्। रराणो रातिरभ्यस्तः−निरु० २।१२। ददानः (त्मना) अ० ५।१२।१०। आत्मना। आत्मबलेन (देवेभ्यः) विद्वद्भ्यः (अग्निः) विद्वान् (हव्यम्) ग्राह्यं पदार्थम् (शमिता) अ० ५।१२।१०। शान्तीकरः (स्वदयतु) स्वादु करोतु ॥
