Devata: इळा, सरस्वती, भारती
Rishi: ब्रह्मा
Chhanda: षट्पदा अनुष्टुब्गर्भा परातिजगती
Swara: अग्नि सूक्त
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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
पुरुषार्थ का उपदेश।
Word-Meaning: - (देव) हे व्यवहार में चतुर (त्वष्टः) सूक्ष्मदर्शी पुरुष ! (नः) हमारे लिये (तत्) वह (तुरीपम्) शीघ्र रक्षा करनेवाला, (अद्भुतम्) अद्भुत, (पुरुक्षु) बहुत अन्न और (रायः) धन की (पोषम्) पुष्टि (अस्य) इस [घर] के (नाभिम्) मध्यदेश में (वि ष्य) खोल दे ॥१०॥
Connotation: - मनुष्य पुरुषार्थपूर्वक पुष्कल अन्न और धन से घरों को परिपूर्ण करके यथावत् पोषण करें ॥१०॥
Footnote: १०−(तत्) (नः) अस्मभ्यम् (तुरीपम्) तुरी−पम्। सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। इति तुर वेगे−इनि, ङीप्+पा रक्षणे−क। तुर्या वेगेन रक्षकम्। तुरीपं पदनाम−निघ० ४।३। तुरीपं तूर्णापि−निरु० ६।२१। (अद्भुतम्) आश्चर्यवत् (पुरुक्षु) आङ्परयोः खनिशॄभ्यां डिच्च। उ० १।३३। इति क्षि निवासगत्योः−कु, स च डित्। क्षु अन्ननाम−निघ० २।७। बह्वन्नम् (देव) हे व्यवहारकुशल (त्वष्टः) सूक्ष्मदर्शिन् (रायः) धनस्य (पोषम्) पुष्टिम् (वि ष्य) विमुञ्च। स्यतिरुपसृष्टो विमोचने−निरु० १।१७। (नाभिम्) मध्यदेशं प्रति (अस्य) गृहस्य ॥
