नास्तिक के तिरस्कार का उपदेश।
Word-Meaning: - (सा) वह [वेदविद्या] (अष्टापदी) [छोटाई, हलकाई, प्राप्ति, स्वतन्त्रता, बड़ाई, ईश्वरपन, जितेन्द्रियता और सत्य संकल्प, आठ ऐश्वर्य] आठ पद प्राप्त करानेवाली (चतुरक्षी) [ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र] चार वर्णों में व्याप्तिवाली, (चतुःश्रोत्रा) [ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास] चार आश्रमों में श्रवण शक्तिवाली, (चतुर्हनुः) [धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष] चार पदार्थों में गतिवाली, (द्व्यास्या) [परमात्मा और जीवात्मा] दोनों का ज्ञान करानेवाली और (द्विजिह्वा) [बाहिरी और भीतरी] दोनों सुखों की जीत करानेवाली (भूत्वा) होकर (ब्रह्मज्यस्य) ब्राह्मण के हानि करनेवाले के (राष्ट्रम्) राज्य को (अवधूनुते) हिला डालती है ॥७॥
Connotation: - वेदविद्या सर्वथा कल्याणी होने से अत्याचारी दुष्टों का नाश कर देती है ॥७॥