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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
Word-Meaning: - (ब्राह्मणः) वेदवेत्ता ब्राह्मण (एव) ही (पतिः) रक्षक है, (न) न (राजन्यः) क्षत्रिय और (न) न (वैश्यः) वैश्य है। (तत्) यह बात (सूर्यः) सर्वप्रेरक परमेश्वर (पञ्चभ्यः) विस्तृत (मानवेभ्यः) मननशील मनुष्यों को (प्रब्रुवन्) कहता हुआ (एति) चलता है ॥९॥
Connotation: - ब्रह्मज्ञानी ही अपनी मानसिक शक्ति से वेद की रक्षा कर सकता है, दूसरे नहीं कर सकते, यह परमेश्वर का वचन है। इसलिये सब मनुष्य मुख्य वेद बल के साथ दूसरे गौण बलों को बढ़ावें ॥९॥
Footnote: ९−(ब्राह्मणः) वेदवेत्ता (एव) निश्चयेन (पतिः) रक्षकः (न) निषेधे (राजन्यः) राजेरन्यः। उ० ३।१००। इति राजृ दीप्तौ ऐश्ये च−अन्य। ऐश्वर्यवान्। क्षत्रियः (न) (वैश्यः) विश्-ष्यञ्। विड्भ्यः प्रजाभ्यो मनुष्येभ्यो वा हितः। वणिक्। व्यवहर्ता (तत्) वचनम् (सूर्यः) सविता सर्वप्रेरकः परमेश्वरः (प्रब्रुवन्) प्रकथयन् (एति) गच्छति (पञ्चभ्यः) सप्यशूभ्यां तुट् च। उ० १।१४७। इति पचि विस्तारे व्यक्तीकारे च−कनिन्। विस्तृतेभ्यः (मानवेभ्यः) मननशीलेभ्यो मनुष्येभ्यः ॥
