Go To Mantra
Viewed 84 times

सु॑प॒र्णस्त्वान्व॑विन्दत्सूक॒रस्त्वा॑खनन्न॒सा। दिप्सौ॑षधे॒ त्वं दिप्स॑न्त॒मव॑ कृत्या॒कृतं॑ जहि ॥

Mantra Audio
Pad Path

सुऽपर्ण: । त्वा । अनु । अविन्दत् । सूकर: । त्वा । अखनत् । नसा । दिप्स । ओषधे । त्वम् । दिप्सन्तम् । अव । कृत्याऽकृतम् । जहि ॥१४.१॥

Atharvaveda » Kand:5» Sukta:14» Paryayah:0» Mantra:1


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

शत्रु के विनाश का उपदेश।

Word-Meaning: - (सुपर्णः) सुन्दर पक्षवाले वा शीघ्रगामी [गरुड़, गिद्ध आदि पक्षी के समान दूरदर्शी पुरुष] ने (त्वा) तुझ को, (अनु=अन्विष्य) ढूँढ़ कर (अविन्दत्) पाया है, (सूकरः) सूकर [सुअर पशु के समान तीव्र बुद्धि और बलवान् पुरुष] ने (त्वा) तुझको (नसा) नासिका से (अखनत्) खोदा है। (ओषधे) हे तापनाशक पुरुष (त्वम्) तू (दिप्सन्तम्) मारने की इच्छा करनेवाले को (दिप्स) मारना चाह, और (कृत्याकृतम्) हिंसाकारी पुरुष को (अव जहि) मार डाल ॥१॥
Connotation: - गिद्ध मोर आदि पक्षी बड़े तीव्रदृष्टि होते हैं, और सूअर एक बलवान् तीव्रबुद्धि पशु अपनी नासिका से खाद्य तृण को भूमि से खोद कर खा जाता है। इसी प्रकार दूरदर्शी पुरुषार्थी बलवान् पुरुष अपने शत्रुओं को खोज कर नाश करता है ॥१॥
Footnote: १−अस्य पूर्वार्धो व्याख्यातः−अ० २।२७।२। (सुपर्णः) सुपर्णाः सुपतना आदित्यरश्मयः−निरु० ३।१२। तथा ४।३। सुपतनः। शीघ्रगामी। गरुडः (त्वा) त्वाम् (अनु) अन्विष्य (अविन्दत्) अलभत (सूकरः) सु+कृ विक्षेपे वा कॄञ् विज्ञाने−अप्। वराहः। तद्वत्तीव्रबुद्धिर्बलवान् वा (त्वा) (अखनत्) विदारितवान् (नसा) नासिकया (दिप्स) अ० ४।३६।१। दम्भितुं हिंसितुमिच्छ (ओषधे) हे तापनाशक पुरुष (त्वम्) (दिप्सन्तम्) हिंसितुमिच्छन्तम् (अव) निश्चये। अनादरे (कृत्याकृतम्) अ० ४।१७।४। हिंसाकारिणम् (जहि) नाशय ॥