मनुष्य की उन्नति का उपदेश।
Word-Meaning: - (जातवेदः) हे बहुत ज्ञान वा धनवाले पुरुष ! (समिद्धः) प्रकाशयुक्त (देवः) दाता तू (अद्य) इस समय (मनुषः) मनुष्य के (दुरोणे) घर में (देवान्) दिव्य गुणों से (यजसि) संगति रखता है। (मित्रमहः) हे मित्रों के सत्कार करनेहारे ! [उन दिव्य गुणों को] (च) निश्चय करके (आवह) तू ला। (त्वम्) तू (चिकित्वान्) विज्ञानवान्, (दूतः) गमनशील वा दुष्टतापक, (कविः) बुद्धिमान् और (प्रचेताः) उत्तम चेतनावाला (असि) है ॥१॥
Connotation: - पुरुषार्थी धार्मिक विद्वान् मनुष्य अपने कुल में प्रकाशित होकर संसार का उपकार करे ॥१॥ यह सूक्त कुछ भेद से ऋग्वेद में है−म० १० सू० ११० और यजुर्वेद में भी है−अ० २९ म० २५, २६, २८-३६। ऋषि जमदग्नि हैं। देवता प्रायः दयानन्दकृत यजुर्वेदभाष्य के अनुसार हमने माने हैं। मन्त्र १-१० निरुक्त में भी व्याख्यात हैं−अ० ८ ख० ५, ६, ८−१४, १७ ॥