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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
Word-Meaning: - (यत्) सबका पूजनीय वा पदार्थों की संगति करनेवाला, (त्रैककुदम्) तीन प्रकार के [आध्यात्मिक आदि] सुखों के पहुँचानेवाले यद्वा तीनों लोकों वा कालों में गतिवाले पुरुषों का ईश्वर, (जातम्) सब में प्रसिद्ध, (हिमवतः) हिंसावाले कर्म से (परि) पृथक् वर्तमान, (आञ्जनम्) संसार का व्यक्त करनेवाला ब्रह्म (सर्वान्) सब (यातून्) पीड़ा देनेवाले दुष्टों (च) और (सर्वाः) सब (यातुधान्यः=०-नीः) पीड़ा देनेवाली शत्रुसेनाओं को (च) भी (जम्भयत्) नाश करनेवाला है ॥९॥
Connotation: - जो पुण्यात्मा पुरुष विद्याबल से सब प्रकार के सुखों को पहुँचाते, और तीनों द्यावापृथिवी और अन्तरिक्ष लोकों, और तीनों भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालों के वृतान्त जानते हैं, वे परब्रह्म की छत्र-छाया में रहकर सब विघ्नों को हटा कर आनन्द भोगते हैं ॥९॥
Footnote: ९−(यत) त्यजितनियजिभ्यो डित्। उ० १।१३२। इति यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु-अदि, स च डित्। यजनीयं पूजनीयम्। पदार्थानां सङ्गतिकारकम् (आञ्जनम्) म० ३। लोकानां व्यक्तीकारकम् ब्रह्म (त्रैककुदम्) तस्येश्वरः। पा० ५।१।४२। इति बाहुलकात् त्रिककुद्-अण्। त्रिककुद्-इति व्याख्यातम् म० ८। त्रिककुदाम् आध्यात्मादित्रिप्रकारस्य सुखस्य प्रापकानां, यद्वा, त्रिषु लोकेषु कालेषु गतिवतां मनुष्याणां ईश्वरम् (जातम्) सर्वत्र प्रादुर्भूतम् (हिमवतः) हन्तेर्हि च। उ० १।१४७। इति हन हिंसागत्योः मक्, हिरादेशः। मतुप्। हिंसायुक्तात् कर्मणः (परि) वर्जने। पृथग् वर्तमानम् (यातून्) कृवापा०। उ० १।१। इति यत ताडने-उण्। पीडकान् राक्षसान् (सर्वान्) अशेषान् (जम्भयत्) नाशयद् वर्तते (सर्वाः) (च) (यातुधान्यः) अ० १।२८।२। शसः स्थाने जस्। यातुधानीः। पीडादायिनीः शत्रुसेनाः ॥
