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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
वैरी के नाश का उपदेश।
Word-Meaning: - (वृकः) हुण्डार वा भेड़िया (परेण) दूर (पथा) मार्ग से (एतु) चला जावे, (उत) और (तस्करः) पीड़ा देनेवाला चोर (परमेण) अधिक दूर मार्ग से। (दत्वती) दान्तवाली (रज्जुः) रसरी अर्थात् साँप (परेण) दूर से, और (अघायुः) बुरा चीतनेवाला पापी (परेण) दूर से (अर्षतु) भाग जावे ॥२॥
Connotation: - मनुष्य अपने घर ऐसे बनावें और ऐसा प्रबन्ध करें, जिससे दुष्ट मनुष्य और हिंसक जीवों से रक्षा रहे ॥२॥
Footnote: २−(परेण) अन्येन दूरेण (एतु) गच्छतु (पथा) मार्गेण (वृकः) म० १। अरण्यश्वा (परमेण) दूरतरेण (उत) अपि (तस्करः) त्यजितनियजिभ्यो डित्। उ० १।१३२। इति तनु विस्तारोपकृतिशब्दोपतापेषु-अदि। तनति उपतापयतीति तद्, उपतापः पीडा। दिवाविभानिशा०। पा० ३।२।२१। इति तत् इत्युपपदे कृञ् करणे-ट प्रत्ययः। तद्बृहतोः करपत्योश्चोरदेवतयोः सुट् तलोपश्च। पा० ६।१।१५७। इति सुट्तलोपौ। तत् उपतापं करोतीति तस्करः। चोरः। (दत्वती) दन्त-मतुप् ङीप्। पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति दत्। दन्तवती (दत्वती रज्जुः) दन्तयुक्तो रज्वाकृतिः सर्पः (अघायुः) अ० १।२०।२। अनिष्टचारी। पापात्मा (अर्षतु) ऋषी गतौ। गच्छतु ॥
