Word-Meaning: - (यौ) जो (मित्रावरुणौ) दिन रात वा प्राण और अपान तुम दोनों ! (मेधातिथिम्) धारणावती बुद्धि के नित्य प्राप्त करनेवाले को और (यौ) जो तुम दोनों (त्रिशोकम्) कायिक, वाचिक, और मानसिक तीन दोषों पर शोक करनेवाले को, और (यौ) जो तुम दोनों (उशनाम्) कामनायोग्य नीति को और (काव्यम्) बुद्धिमानों के कर्म को (अवथः) बचाते हो। (यौ) जो तुम दोनों (गोतमम्) अतिशय स्तुति करनेवाले वा विद्या की कामना करनेवाले को (उत) और (मुद्गलम्) मोद अर्थात् हर्ष देनेवाले को (प्र) अच्छे प्रकार (अवथः) बचाते हो। (तौ) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥६॥
Connotation: - जो मनुष्य तपश्चर्या करके अपने समय और शारीरिक मानसिक शक्तियों का यथावत् उपयोग करते हैं, वे उत्तम नीति और कर्म प्राप्त करके आनन्दित होते हैं ॥६॥