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यथा॑ ह॒व्यं वह॑सि जातवेदो॒ यथा॑ य॒ज्ञं क॒ल्पय॑सि प्रजा॒नन्। ए॒वा दे॒वेभ्यः॑ सुम॒तिं न॒ आ व॑ह॒ स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥

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Pad Path

यथा । हव्यम् । वहसि । जातऽवेद: । यथा । यज्ञम् । कल्पयसि । प्रऽजानन् । एव । देवेभ्य: । सुऽमतिम् । न: । आ । वह । स: । न: । मुञ्चतु । अंहस: ॥२३.२॥

Atharvaveda » Kand:4» Sukta:23» Paryayah:0» Mantra:2


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

कष्ट हटाने के लिये उपदेश।

Word-Meaning: - (जातवेदः) हे उत्पन्न पदार्थों के जाननेवाले परमेश्वर ! (यथा) जिस प्रकार से (हव्यम्) देने वा खाने योग्य अन्न को (वहसि) तू पहुँचाता है, (यथा) जिस प्रकार से (यज्ञम्) पूजनीय कर्म को (प्रजानन्) अच्छे प्रकार जानता हुआ (कल्पयसि) तू रचता है। (एव) वैसे ही (देवेभ्यः) दिव्य गुणों के लिये (सुमतिम्) सुमति (नः) हमें (आवह)) पहुँचा, (सः) वह (नः) हमें (अंहसः) पीड़ा से (मुञ्चतु) छुड़ावे ॥२॥
Connotation: - परमेश्वर ने पुष्टिकारक और सुखदायक अन्न सूर्य आदि पदार्थ उत्पन्न करके हम पर बड़ा उपकार किया है, उसके गुणों को जानकर विज्ञानपूर्वक अपनी धार्मिक बुद्धि बढ़ावें और दुष्कर्मों से पृथक् रहकर जीवनलाभ ठावें ॥२॥
Footnote: २−(यथा) येन प्रकारेण (हव्यम्) अ० ३।३।४। हु दानादनयोः-यत्। दातव्यं भोक्तव्यं वान्नम् (वहसि) प्रापयसि (जातवेदः) अ० १।७।२। जातानामुत्पन्नानां वेदितः (यज्ञम्) यजनीयं पूजनीयं कर्म (कल्पयसि) विरचयसि (प्रजानन्) प्रकर्षेणावगच्छन् (एव) एवम्। तथा (देवेभ्यः) दिव्यगुणानां प्राप्तये (सुमतिम्) धार्मिकां बुद्धिम् (नः) अस्मान् (आवह) द्विकर्मकः। प्रापय। अन्यद् गतम्-म० १ ॥