विद्या के गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे मनुष्यप्रजाओ !] (प्रजावतीः) उत्तम सन्तानवाली, (सुयवसे) सुन्दर यव आदि अन्नवाले [घर] में [अन्न] (रुशन्तीः) खाती हुईं, और (सुप्रपाणे) सुन्दर जलस्थान में (शुद्धाः) शुद्ध (अपः) जलोंको (पिबन्तीः) पीती हुईं (वः) तुमको (स्तेनः) चोर (मा ईशत) वश में न करे, और (मा) न (अघशंसः) बुरा चीतनेवाला, डाकू उचक्का आदि [वश में करे]। (रुद्रस्य) पीड़ानाशक परमेश्वर की (हेतिः) हननशक्ति (वः) तुमको (परि) सब ओर से (वृणक्तु) त्यागे रहे ॥७॥
Connotation: - मनुष्य विद्याएँ उपार्जन करके अपनी सन्तानों को उत्तम शिक्षा देते हुए और अन्न जल आदि का सुप्रबन्ध करते हुए सदा हृष्ट पुष्ट बुद्धिमान् और धर्मिष्ठ रहें, जिससे उन्हें न चोर आदि सता सके और न परमेश्वर दण्ड देवे ॥७॥ (मा व स्तेन इति) यह पाद य० १।१ और (परि वो रुद्रस्येति) यह पाद य० १६।५०। में है ॥