Word-Meaning: - (हिरण्यगर्भः) तेजवाले लोकों का आधार (अग्रे) पहिले ही पहिले (सम्) ठीक-ठीक (अवर्तत) वर्त्तमान था। वही (जातः) प्रकट होकर (भूतस्य) पृथिवी आदि पञ्चभूत का (एकः) एक (पतिः) पति, ईश्वर (आसीत्) हुआ, (सः) उसने (पृथिवीम्) पृथिवी (उत) और (द्याम्) सूर्य को (दाधार) धारण किया, उस (कस्मै) सुखदायक प्रजापति परमेश्वर की (देवाय) दिव्य गुण के लिये (हविषा) भक्ति के साथ (विधेम) हम सेवा किया करें ॥७॥
Connotation: - सर्वशक्तिमान् अविनाशी परमात्मा प्रलयकाल में विद्यमान था। उसके कर्मों से ज्ञात होता है कि उस अकेले ने सूक्ष्म पञ्चभूत का यथावत् संयोग वियोग करके पृथिवी, सूर्य आदि सृष्टि को रचा और धारण किया है, उसकी उपासना से उत्तम गुण प्राप्त करके आनन्द भोगें ॥७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० १०।१२१।१, यजु० १३।४ तथा २५।१० और निरु० १०।२३ में है ॥