आपो॒ अग्रे॒ विश्व॑माव॒न्गर्भं॒ दधा॑ना अ॒मृता॑ ऋत॒ज्ञाः। यासु॑ दे॒वीष्वधि॑ दे॒व आसी॒त्कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥
Pad Path
आप: । अग्रे । विश्वम् । आवन् । गर्भम् । दधाना: । अमृता: । ऋतऽज्ञा: । यासु । देवीषु । अधि । देव: । आसीत् । कस्मै । देवाय । हविषा । विधेम ॥२.६॥
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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
Word-Meaning: - (गर्भम्) बीज को (दधानाः) धारण करते हुए, (अमृताः) मरणरहित [जीवन शक्तिवाले] (ऋतज्ञाः) सत्य नियम को जाननेवाले (आपः) उन व्यापक जलों [वा तन्मात्राओं] ने (अग्रे) पहिले (विश्वम्) जगत् की (आवन्) रक्षा की थी, (यासु देवीषु अधि) जिन दिव्य गुणवालों के ऊपर (देवः) परमेश्वर (आसीत्) था उस (कस्मै) सुखदायक प्रजापति परमेश्वर की (देवाय) दिव्य गुण के लिये (हविषा) भक्ति के साथ (विधेम) हम सेवा किया करें ॥६॥
Connotation: - सृष्टि की आदि में ईश्वर नियम से जल [वा तन्मात्रा] के भीतर जगत् का बीज और जीवन सामर्थ्य था, जिससे यह सृष्टि हुई है। उसी परमात्मा के नियम पर चलकर हम अपने जीवन को पुरुषार्थ करके सुधारें ॥६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० १०।१२१।७, ८ और यजु० २७।२५, २६ में हैं। मनु महाराज ने भी ऐसा कहा है-मनु १।८ ॥ सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः। अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ उस परमात्मा ने सब ओर ध्यान करके अपने शरीर [अव्याकृत रूप वा सामर्थ्य] से नाना विध प्रजाएँ उत्पन्न करने की इच्छा करते हुए जलही पहिले उत्पन्न किया और उसमें बीज छोड़ दिया ॥
Footnote: ६−(आपः) अ० १।४।३। जलानि। व्यापिकास्तन्मात्राः-इति दयानन्दो यजुर्वेदभाष्ये २७।२५। (अग्रे) सृष्ट्यादौ (विश्वम्) सर्वं जगत् (आवन्) अव रक्षणगत्यादिषु-लङ्। अरक्षन् (गर्भम्) अ० ३।१०।१२। बीजम्। मूलम्। प्रधानम् (दधानाः) दधातेः शानच्। धारयन्त्यः। धरन्त्यः सत्यः (अमृताः) नास्ति मृतं मरणं याभिस्ताः। मरणरहिताः। प्राप्तजीवनशक्तयः (ऋतज्ञाः) आतोऽनुपसर्गे कः। पा० ३।२।३। इति ऋत+ज्ञा बोधे-क। टाप्। ऋतं सत्यं नियमं जानानाः (यासु) अप्सु (देवीषु) दिव्यगुणसंपन्नासु (अधि) अधिकम्। उपरि (देवः) परमेश्वरः (आसीत्) अभवत्। अन्यद् व्याख्यातम्-म० १ ॥
