Word-Meaning: - (यम्) जिसको (चस्कभाने) परस्पर रोकती हुई (क्रन्दसी) ललकारती हुई दो सेनाएँ (अवतः) प्राप्त होती हैं, और [जिसको] (भियसाने) हे डरती हुई (रोदसी) सूर्य और भूमि ! (आह्वयेथाम्) तुम दोनों ने पुकारा है। (यस्य) जिसका (असौ पन्थाः) यह मार्ग (रजसः) संसार का (विमानः) विविध प्रकार नापनेवाला वा विमान रूप है, उस (कस्मै) प्रजापति सुखदाता परमेश्वर की (देवाय) उत्तम गुण के लिये (हविषा) भक्ति के साथ (विधेम) हम सेवा किया करें ॥३॥
Connotation: - परमेश्वर को ही दो लड़ती हुई सेनाएँ पुकारती हैं, उसीकी आज्ञा में सूर्य आदि लोक रहते हैं, उसीकी व्याप्ति संसार भर में है, उसी परब्रह्म की भक्ति करके सब मनुष्य पुरुषार्थ करें ॥३॥ इस मन्त्र का पूर्वार्ध कुछ भेद से ऋ० १०।१२१।६ और यजु० ३२।७। और उत्तरार्ध यजु० ३२।६ में है ॥