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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
वृष्टि की प्रार्थना और गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (संवत्सरम्) बोलने के समय तक (शशयानाः) शयन करनेवाले (मण्डूकाः) शोभा बढ़ानेवाले वा डुबकी लगानेवाले मेंडुके, (व्रतचारिणः) व्रतधारी (ब्राह्मणाः) ब्राह्मणों के समान, (पर्जन्यजिन्विताम्) मेह से तृप्त की हुई (वाचम्) वाणी को (प्र) अच्छे प्रकार (अवादिषुः) बोलें ॥१३॥
Connotation: - जैसे वेदज्ञानी पुरुष वेदों में मौन [मनन] व्रत साधकर सत्य ज्ञान से तृप्त होकर संसार में उपदेश करते हैं, इसी प्रकार मेंडुके वृष्टि होने से संतुष्ट होकर बोलते हैं ॥१३॥ यह मन्त्र ऋ० ७।१०३।१। में है और निरुक्त ९।६। में भी व्याख्यात है ॥
Footnote: १३−(संवत्सरम्) संपूर्वाच्चित्। उ० ३।७२। इति बाहुलकात् सम्+वद कथने-सरन् प्रत्ययः, स च चित्। चित्वादन्तोदात्तः। सम्यग् वदनपर्यन्तम्। वर्षारम्भपर्यन्तम् इत्यर्थः (शशयानः) शिश्यानाः शयानाः. शयनशीलाः। निद्रालवः (ब्राह्मणाः) अ० २।६।३। वेदपाठिनः। ब्रह्मज्ञानिनो यथा (व्रतचारिणः) व्रत+चर-णिनि। कृतसंयमाः (वाचम्) वाणीम् (पर्जन्यजिन्विताम्) जिवि प्रीणने-क्त। पर्जन्येन प्रीतां तर्पिताम् (प्र) प्रकर्षेण (मण्डूकाः) म० १२। मज्जूकाः। भेकाः (अवादिषुः) वद-लुङ्। अवोचन् ॥
