यदि॑ क॒र्तं प॑ति॒त्वा सं॑श॒श्रे यदि॒ वाश्मा॒ प्रहृ॑तो ज॒घान॑। ऋ॒भू रथ॑स्ये॒वाङ्गा॑नि॒ सं द॑ध॒त्परु॑षा॒ परुः॑ ॥
Pad Path
यदि । कर्तम् । पतित्वा । सम्ऽशश्रे । यदि । वा । अश्मा । प्रऽहृत: । जघान । ऋभु: । रथस्यऽइव । अङ्गानि । सम् । दधत् । परुषा । परु: ॥१२.७॥
Atharvaveda » Kand:4» Sukta:12» Paryayah:0» Mantra:7
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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
अपने दोष मिटाने का उपदेश।
Word-Meaning: - (यदि) यदि (कर्तम्) कटारी आदि हथियार ने (पतित्वा) गिर कर (संशश्रे) काट दिया है, (यदि वा) अथवा (प्रहृतः) फेंके हुए (अश्मा) पत्थर ने (जघान) चोट लगाई है। (ऋभुः) बुद्धिमान् पुरुष (रथस्य अङ्गानि इव) रथ के अङ्गों के समान (परुः) एक जोड़े को (परुषा) दूसरे जोड़ से ( सं दधत्) मिला देवे ॥७॥
Connotation: - बुद्धिमान् पुरुष अपने विचलित मन को इस प्रकार ठीक करे, जैसे चिकित्सक चोट को और शिल्पी टूटे रथ को फिर जोड़कर सुधार लेते हैं ॥७॥
Footnote: ७−(यदि) पक्षान्तरे। सम्भावनायाम् (कर्तम्) कृती छेदने-घञ्। कर्तकं छेदकमायुधम्। कर्त्तरी। कृपाणी (पतित्वा) अधः प्राप्य (संशश्रे) शॄ हिंसायाम्-लिट्। संशृणाति स्म। संहिनस्ति स्म (यदि वा) अपि वा (अश्मा) प्रस्तरः (प्रहृतः) प्रक्षिप्तः (जघान) हन-लिट्। हतवान् (ऋभुः) अ० १।२।३। मेधावी-निघ० ३।५। (रथस्य) (इव) यथा (अङ्गानि) अक्षचक्रेषायुगादीनि (सं दधत्) संदधातु। संयोजयतु (परुषा) पर्वान्तरेण (परुः) पर्व ॥
