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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
तेज, बल, आयु, धनादि बढ़ाने का उपदेश।
Word-Meaning: - (पर्णमणे) हे पालन करनेवालों में प्रशंसनीय ! तू (मयि) मुझमें (क्षत्रम्) बल और (मयि) मुझमें ही (रयिम्) सम्पत्ति (धारयतात्) स्थापित कर। (अहम्) मैं (राष्ट्रस्य) राज्य के (अभीवर्गे) मण्डल में (निजः) आप ही (उत्तमः) उत्तम (भूयासम्) बना रहूँ ॥२॥
Connotation: - मनुष्य सर्वशक्तिमान् परमेश्वर का ध्यान करता हुआ अपने बुद्धिबल और बाहुबल से शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति और सुवर्णादि धन प्राप्त करके संसार भर में कीर्ति बढ़ावे और आनन्द भोगे ॥२॥
Footnote: २−(मयि)। ईश्वरोपासके। (क्षत्रम्)। अ० २।१५।४। क्षतो हिंसनात् त्रायते। बलम्। (पर्णमणे)। म० १। हे पालकेषु प्रशंसनीय। (धारयतात्) धारयतेर्हेस्तातङ् आदेशः। धारय। स्थापय। (रयिम्)। अ० १।१५।२। रा दानादानयोः-इ, युक्। धनम्-निघ० २।१०। सम्पत्तिम्। (राष्ट्रस्य)। अ० १।२९।१। राज्यस्य। (अभीवर्गे)। अभि+वृजी वर्जने-घञ्। उपसर्गस्य घञ्यमनुष्ये बहुलम्। पा० ६।३।१२२। इति दीर्घः। अभिगतो वर्गो मनुष्यादि-समूहो यस्मिन्। राज्यमण्डले। (निजः)। नि+जनी प्रादुर्भावे-ड। निश्चयेन जायते। स्वकीयः। (भूयासम्)। भू-आशीर्लिङ्। अहं भवानि। (उत्तमः)। उत्कृष्टतमः ॥
