Reads 76 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
परस्पर मेल का उपदेश।
Word-Meaning: - (पुत्रः) कुलशोधक पवित्र, बहुरक्षक वा नरक से बचानेवाला पुत्र [सन्तान] (पितुः) पिता के (अनुव्रतः) अनुकूल व्रती होकर (मात्रा) माता के साथ (संमनाः) एक मनवाला (भवतु) होवे। (जाया) पत्नी (पत्ये) पति से (मधुमतीम्) जैसे मधु में सनी और (शन्तिवाम्) शान्ति से भरी (वाचम्) वाणी (वदतु) बोले ॥२॥
Connotation: - सन्तान माता पिता के आज्ञाकारी, और माता पिता सन्तानों के हितकारी, पत्नी और पति आपस में मधुरभाषी तथा सुखदायी हों। यही वैदिक कर्म आनन्दमूल है। मन्त्र १ देखो ॥२॥
Footnote: २−(अनुव्रतः) पृषिरञ्जिभ्यां कित्। उ० ३।१११। इति वृञ् वरणे अतच्-कित्त्वाद् गुणाभावे यणादेशः। व्रतमिति कर्मनाम वृणोतीति सतः-निरु० २।१३। अनुकूलकर्मा। (पितुः) रक्षकस्य। जनकस्य (पुत्रः) अ० १।११।५ पुनातीति पुत्रः कुलशोधकः। पवित्रः। पुरुत्रात् पुतो नरकात् त्राता वा। सन्तानः। (मात्रा) अ० १।२।१। माननीयया जनन्या सह। (संमनाः) समानमनस्कः (जाया) अ० ३।४।३। जनयति वीरान्। भार्या। पत्नी। (पत्ये) भर्त्रे। (मधुमतीम्) क्षौद्रयुक्तां यथा। माधुर्यवतीम्। (शन्तिवाम्) शमु उपशमे-क्तिन्। छान्दसो ह्रस्वः। वप्रकरणेऽन्येभ्योऽपि दृश्यते। वा० पा० ५।२।१०९। इति मत्वर्थे व प्रत्ययः। टाप्। शान्तियुक्ताम्। सुखोपेताम् ॥
