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शत॑हस्त स॒माह॑र॒ सह॑स्रहस्त॒ सं कि॑र। कृ॒तस्य॑ का॒र्य॑स्य चे॒ह स्फा॒तिं स॒माव॑ह ॥

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Pad Path

शतऽहस्त । सम्ऽआहर । सहस्रऽहस्त । सम् । किर । कृतस्य । कार्यस्य । च । इह । स्फातिम् । सम्ऽआवह ॥२४.५॥

Atharvaveda » Kand:3» Sukta:24» Paryayah:0» Mantra:5


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

धान्य बढ़ाने के कर्म का उपदेश।

Word-Meaning: - (शतहस्त) हे सैकड़ों हाथोंवाले ! [मनुष्य !] [धान्य को-म० ४] (समाहर) बटोर कर ला, और (सहस्रहस्त) हे सहस्रों हाथोंवाले (सम्) अच्छे प्रकार से (किर) फैला। (च) और (कृतस्य) किये हुए और (कार्यस्य) कर्तव्य कर्म की (स्फातिम्) बढ़ती को (इह) यहाँ पर (समावह) मिलकर ला ॥५॥
Connotation: - मनुष्य सैकड़ों तथा सहस्रों प्रकार से कर्मकुशल होकर, और सहस्रों कर्मकुशलों से मिलकर धन धान्य एकत्र करे और उत्तम कर्मों में व्यय करके आगा पीछा सोचकर सदैव उन्नति करता रहे ॥५॥
Footnote: ५−(शतहस्त) हे बहुप्रकारेण हस्तक्रियाकुशल। हे बहुक्रियाकुशलपुरुषैर्युक्त मनुष्य ! (समाहर) समाहृत्य प्राप्नुहि। (सहस्रहस्त) असंख्यहस्तक्रियाकुशलपुरुषैर्युक्त ! (सम्) सम्यक्। शोभनरीत्या। (किर) कॄ विक्षेपे। ॠत इद्धातोः। पा० ७।१।१०। इति इत्त्वम्। विक्षिप। प्रयच्छ। (कृतस्य) निष्पन्नस्य। (कार्यस्य) ऋहलोर्ण्यत्। पा० ३।१।१२४। इति कृञ्-ण्यत्। कर्त्तव्यस्य कर्मणः। (स्फातिम्) म० ४। समृद्धिम्। (समाहर) सम्यग् आनय ॥