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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
कीर्ति पाने के लिये उपदेश।
Word-Meaning: - (यावत्) जितनी दूर (चतस्रः) चारों (प्रदिशः) महादिशायें हैं, और (यावत्) जितनी दूर (चक्षुः) आँख [दर्शन शक्ति] (समश्नुते) फैलती है, (तावत्) वहाँ तक (मयि) मुझमें (तत्) वह (हस्तिवर्चसम्) हाथी के बलवाला (इन्द्रियम्) परम ऐश्वर्य (समैतु) आकर मिले ॥५॥
Connotation: - मनुष्य सब पार्थिव और दिव्य पदार्थों के यथावत् ज्ञान से सामर्थ्य बढ़ाकर उन्नति करें ॥५॥
Footnote: ५−(चतस्रः) चतुःसंख्याकाः। (प्रदिशः) महादिशः। (चक्षुः) अ० १।३३।४। नेत्रं दर्शनसामर्थ्यम्। (समश्नुते) सम्यग् व्याप्नोति (समैतु) सम्+आ एतु। सम्यग् आगच्छतु। (इन्द्रियम्) अ० १।३५।३। इन्द्र-घञ्। इन्द्रस्य परमैश्वर्ययुक्तस्य लिङ्गम्। परमैश्वर्यम्। (मयि) ईश्वरभक्ते। (तत्) प्रसिद्धम्। (हस्तिवर्चसम्) म० १। गजस्य बलयुक्तम् ॥
