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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (ये) जो (पर्वताः) पहाड़ (सोमपृष्ठाः) सोम [अमृत अर्थात् ओषधि वा जल] को पीठ पर रखनेवाले हैं, [उन्होंने और] (उत्तानशीवरीः वर्यः) ऊपर को मुख करके सोनेवाले [सूर्य की ओर चढ़नेवाले] (आपः) जल, (वातः) पवन, (पर्जन्यः) मेघ, (आत्) और (अग्निः) अग्नि, (ते) उन सबने (क्रव्यादम्) मांसभक्षक [अग्नि रूप दुःख] को (अशीशमन्) शान्त कर दिया है ॥१०॥
Connotation: - मनुष्य प्रयत्न करें कि सोमलता आदि औषध उत्पन्न करनेवाले पर्वत, जल, वायु, मेघ, अग्नि आदि सब पदार्थ शुद्ध रहकर सुखदायक होवें ॥१०॥
Footnote: १०−(पर्वताः) पर्व पूर्त्तौ-अतच्। शैलाः। (सोमपृष्ठाः) सोमः, अमृतम् ओषधिर्जलं वा पृष्ठे उपरिभागे येषां ते तथाभूताः। (आपः) जलानि। (उत्तानशीवरीः) उत्+तनु विस्तारे-घञ्। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति शीङः क्वनिप्। वनो र च। पा० ४।१।७। इति ङीब्रेफौ। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०६। इति जसि पूर्व सवर्णदीर्घः। ऊर्ध्वमुखशयाः। सूर्याभिमुखवर्त्तमानाः। (वातः) वायुः। (पर्जन्यः)। सेचको मेघः। (आत्) अपि च। (अग्निः) पावकः। (क्रव्यादम्) मांसभक्षकं रोगम्। (अशीशमन्) शमु णिच्, लुङि। शान्तं कृतवन्तः ॥
