इ॑न्द्रवा॒यू उ॒भावि॒ह सु॒हवे॒ह ह॑वामहे। यथा॑ नः॒ सर्व॒ इज्जनः॒ संग॑त्यां सु॒मना॑ अस॒द्दान॑कामश्च नो॒ भुव॑त् ॥
Pad Path
इन्द्रवायू इति । उभौ । इह । सुऽहवा । इह । हवामहे । यथा । न: । सर्व: । इत् । जन: । सम्ऽगत्याम् । सुऽमना: । असत् । दानऽकाम: । च । न: । भुवत् ॥२०.६॥
Atharvaveda » Kand:3» Sukta:20» Paryayah:0» Mantra:6
Reads 45 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
Word-Meaning: - (उभौ) दोनों (सुहवा=०-वौ) सुख से बुलाने योग्य (इन्द्रवायू) सूर्य और पवन [के समान स्त्री पुरुष] को (इह इह) यहाँ पर ही (हवामहे) हम बुलाते हैं, (यथा) जिससे (सर्वः इत्) सभी (जनः) जने (नः) हमारी (संगत्याम्) संगति में (सुमनाः) प्रसन्न चित्तवाले (असत्) होवें, (च) और (नः) हमारी (दानकामः) दान के लिए कामना (भुवत्) होवे ॥६॥
Connotation: - सब स्त्री पुरुष प्रयत्न करके घर में और सभा में परस्पर परोपकारी, प्रसन्न चित्त, धार्मिक और धर्मकार्यों में दानशील हों, जैसे सूर्य अपने प्रकाश और वृष्टि आदि से और पवन अपने चेष्टादान और शीघ्रगमन आदि से असंख्य लाभ पहुँचाते हैं ॥६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद ३३।८६ में है ॥
Footnote: ६−(इन्द्रवायू) ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्। पा० १।१।११। इति उभौ परे प्रकृतिभावः। सूर्यपवनसदृशौ स्त्रीपुरुषौ। (उभौ) द्वौ। (इह इह) अस्मिन्नेव गृहे समाजे वा। (सुहवा) ईषद्दुःसुषु०। पा० ३।३।१२६। सु+ह्वयतेः-खल्। सुहवौ सुखेन ह्वातुं शक्यौ। (हवामहे) आह्वयामः। (यथा) यस्मात्। (नः) अस्माकम् (इत्) एव। (जनः) लोकः। (संगत्याम्) समितौ। सभायाम्। (सुमनाः) प्रसन्नचित्तः। (असत्, भुवत्) लेटि रूपम्। भवेत्। (दानकामः) दानाय कामः, अभिलाषः ॥
