Go To Mantra

अ॒सौ या सेना॑ मरुतः॒ परे॑षाम॒स्मानैत्य॒भ्योज॑सा॒ स्पर्ध॑माना। तां वि॑ध्यत॒ तम॒साप॑व्रतेन॒ यथै॑षाम॒न्यो अ॒न्यं न जा॒नात् ॥

Mantra Audio
Pad Path

असौ । या । सेना । मरुत: । परेषाम् । अस्मान् । आऽएति । अभि । ओजसा । स्पर्धमाना ।ताम् । विध्यत । तमसा । अपऽव्रतेन । यथा । एषाम् । अन्य: । अन्यम् । न । जानात् ॥२.६॥

Atharvaveda » Kand:3» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:6


Reads 44 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (मरुतः) हे शूर पुरुषों ! (परेषाम्) वैरियों की (असौ) वह (या) जो (सेना) सेना (अस्मान्) हम पर (अभि) चारों ओर से (ओजसा) बल के साथ (स्पर्धमाना) ललकारती हुई (आ-एति) चढ़ी आती है। (ताम्) उसको (अपव्रतेन) क्रियाहीन कर देनेवाले (तमसा) अन्धकार से (विध्यत) छेद डालो, (यथा) जिससे (एषाम्) इनमें से (अन्यः) कोई (अन्यम्) किसी को (न) न (जानात्) जाने ॥६॥
Connotation: - सेनापति अपनी पलटनों को घातस्थानों में इस प्रकार खड़ा करे कि आती हुई शत्रुसेना को रोककर सब नष्ट कर देवें ॥६॥ (मरुतः) शब्द के लिये अ० १।२०।१। देखो ॥ यह मन्त्र यजुर्वेद में इस प्रकार है−अ॒सौ या सेना॑ मरु॒तः परे॑षाम॒भ्यैति॑ न॒ ओज॑सा॒ स्पर्ध॑माना। तां गू॑हत तम॒साप॑व्रतेन॒ यथा॒मी ऽअ॒न्योऽअ॒न्यन्न जा॒नन् ॥ यजु०। १७।४७ ॥ (मरुतः) हे शूरों ! (परेषाम्) वैरियों की (असौ या सेना) वह जो सेना (नः) हमको (अभि) चारों ओर से (ओजसा स्पर्धमाना) बल के साथ ललकारती हुई (आ, एति) चली आती है। (ताम्) उसको (अपव्रतेन तमसा) क्रियाहीन कर देनेवाले अन्धकार से (गूहत) ढक दो, (यथा) जिससे (अमी) वे लोग (अन्यः, अन्यम्) एक दूसरे को (न जानन्) न जानें ॥
Footnote: ६−(असौ)। परिदृश्यमाना। (वा सेना)। सू० १ म० १। सैन्यम्। (मरुतः)। अ० १।२०।१। हे शत्रुमारणशीलाः। शूराः। (आ-एति)। आगच्छति। (अभि)। सर्वतः। (ओजसा)। बलेन। (स्पर्धमाना)। स्पर्ध संघर्षे-लटः शानच्। संघर्षं युद्धोद्यमं कुर्वाणा। (ताम्)। सेनाम्। (विध्यत)। ताडयत। छिन्त। (तमसा)। अन्धकारेण। (अपव्रतेन)। व्रतं कर्म-निघ० २।१। अपगतकर्मणा। सर्वव्यापारविघातकेन। (यथा)। येन प्रकारेण। (एषाम्)। उपस्थिनां शत्रूणाम्। (अन्यः)। कश्चित्। (अन्यम्)। कमपि। (न)। निषेधे। (जानात्)। ज्ञा अवयोधने-लेट्। इतश्च लोपः परस्मैपदेषु। पा० ३।४।९७। इकारलोपः। जानीयात् ॥