Go To Mantra
Viewed 102 times

शुना॑सीरे॒ह स्म॑ मे जुषेथाम्। यद्दि॒वि च॒क्रथुः॒ पय॒स्तेनेमामुप॑ सिञ्चतम् ॥

Mantra Audio
Pad Path

शुनासीरा । इह । स्म । मे । जुषेथाम् । यत् । दिवि । चक्रथु: । पय: । तेन । इमाम् । उप । सिञ्चतम् ॥१७.७॥

Atharvaveda » Kand:3» Sukta:17» Paryayah:0» Mantra:7


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

खेती की विद्या का उपदेश।

Word-Meaning: - (शुनासीरा=०-रौ) हे वायु और सूर्य तुम दोनों ! (इह स्म) यहाँ पर ही (मे) मेरी [विनय] (जुषेथाम्) स्वीकार करो, (यत् पयः) जो जल (दिवि) आकाश मे (चक्रथुः) तुम दोनों ने बनाया है, (तेन) उससे (इमाम्) इस [भूमि] को (उप सिञ्चतम्) सींचते रहो ॥७॥
Connotation: - पवन और सूर्य के द्वारा पृथिवी का जल आकाश में जाकर फिर पृथिवी पर बरसता है, वह खेती के लिए बहुत उपयोगी होता है ॥७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से निरु० ९।४१ में भी है ॥
Footnote: ७−(शुनासीरा) म० ५। हे पवनादित्यौ। (इह स्म) अत्रैव। (जुषेथाम्) युवां सेवेथाम्। स्वीकुरुतम्। (दिवि) आकाशे। (चक्रथुः) डुकृञ् करणे लिट्। युवां कृतवन्तौ। (पयः) उदकम्। निघ० १।१२। (इमाम्) दृश्यमानां भूमिम्। (उप सिञ्चतम्) व्याप्य आर्द्रीकुरुतम् ॥