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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
युद्ध विद्या का उपदेश।
Word-Meaning: - (मघवन्) हे धनवान्, (वृत्रहन्) अन्धकार वा शत्रुओं के नाश करनेवाले, (इन्द्र) सूर्य [समान तेजस्वी] (च) और (अग्निः) हे अग्नि [समान शत्रुदाहक] ! (युवम्) तुम दोनों (अस्मान्) हम पर (शत्रूयतीम्) शत्रुओं के समान आचरण करती हुई (अमित्रसेनाम्) बैरियों की सेना को (अभि=अभिभूय) हराकर (तान्) चोरों वा म्लेच्छों की (प्रति, दहतम्) जला डालो ॥३॥
Connotation: - जैसे सूर्य अन्धकार का नाश करके और अग्नि अशुद्धतादि दुर्गुणों को जलाकर हटाते और अनेक प्रकार से उपयोगी होते हैं, ऐसे ही धनी और प्रतापी राजा कुमार्गियों को हटाकर उपकारी होवें ॥३॥
Footnote: ३−(अमित्रसेनाम्)। अमित्रशब्दो व्याख्यातः-अ० २।२८।३। अम पीडने इत्रच्। पीडकसेनाम्। (मघवन्)। हे धनवन्। (अस्मान्)। प्रजागणान्। (शत्रूयतीम्)। उपमानादाचारे। पा० ३।१।१०। इति शत्रु-क्यच्। अकृत्सार्वधातुकयोः। पा० ७।४।२५। इति दीर्घः। तदन्तात् शतरि। उगितश्च। पा० ४।१।६। इति ङीप्। शतुरनुमो०। पा० ६।१।१७३। इति ङीप उदात्तत्वम्। शत्रूनिव आचरन्तीम्। (अभि)। अभिभूय। (युवम्)। युवाम्। (तान्)। तर्द हिंसे-ड। तर्दति हिनस्तीति तः। चेरान्। म्लेच्छान्। (इन्द्र)। सूर्यवत्प्रतापिन्। (वृत्रहन्)। अ० १।२१।१। हे अन्धकारनाशक। शत्रुघातक। (अग्निः)। हे अग्निवद् दाहक। च। (समुच्चये)। (दहतम्)। भस्मीकुरुतम्। (प्रति)। प्रातिकूल्येन ॥
