Go To Mantra
Viewed 134 times

यस्त॑ ऊ॒रू वि॒हर॑त्यन्त॒रा दम्प॑ती॒ शये॑। योनिं॒ यो अ॒न्तरा॒रेढि तमि॒तो ना॑शयामसि ॥

Mantra Audio
Pad Path

य: । ते । ऊरू इति । विऽहरति । अन्तरा । दम्पती इति दम्ऽपती । शये ॥ योनिम् । य: । अन्त: । आऽरेल्हि । तम् । इत: । नाशयामसि ॥९६.१४॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:96» Paryayah:0» Mantra:14


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

गर्भरक्षा का उपदेश।

Word-Meaning: - (यः) जो कोई [रोग] (ते) तेरी (ऊरू) दोनों जंघाओं को (विहरति) फैला दे और (दम्पती अन्तरा) पति-पत्नी के बीच में (शये) पड़ जावे और (यः) जो कोई [रोग] (योनिम्) योनि को (अन्तः) भीतर से (आरेढि) चाट लेवे, (तम्) उस [रोग] को (इतः) यहाँ से (नाशयामसि) हम नाश करें ॥१४॥
Connotation: - जिस रोग से स्त्री की जांघें फैल जावें, और जिस रोग से सन्तान उत्पन्न करने में स्त्री-पुरुषों को विघ्न होवें और योनि आदि में सूखा का रोग लग जावे, उस सबका औषध करना चाहिये ॥१४॥
Footnote: १४−(यः) रोगः (ते) तव (ऊरू) जङ्घे। पादमूलौ (विहरति) विश्लिष्टे करोति (दम्पती अन्तरा) जायापत्न्योर्मध्ये (शये) शेते। वर्तते (योनिम्) गर्भाशयम् (यः) रोगः (अन्तः) मध्ये (आरेढि) लिह आस्वादने, आदादिकः, कपिलकादित्वाल् लत्वविकल्पः। आस्वादयति। शोषयति निषक्तं रेतः। अन्यत् पूर्ववत् ॥