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त्वमि॑न्द्रासि वृत्र॒हा व्यन्तरि॑क्ष॒मति॑रः। उद्द्याम॑स्तभ्ना॒ ओज॑सा ॥

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त्वम् । इन्द्र । असि । वृत्रऽहा । वि । अन्तरिक्षम् । अतिर: ॥ उत् । द्याम् । अस्तभ्ना : । ओजसा ॥९३.६॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:93» Paryayah:0» Mantra:6


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमेश्वर की उपासना का उपदेश।

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (त्वम्) तू (वृत्रहा) अन्धकारनाशक (असि) है, (अन्तरिक्षम्) आकाश को (वि अतिरः) तूने फैलाया है, और (ओजसा) पराक्रम के साथ (द्याम्) चमकते हुए सूर्य को (उत्) उत्तम रीति से (अस्तभ्नाः) थाँभा है ॥६॥
Connotation: - परमेश्वर ही आकर्षण नियम से सूर्य आदि लोकों को अपने-अपने स्थान पर आकाश में स्थिर रखता है ॥६॥
Footnote: ६−(त्वम्) (इन्द्र), परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (असि) (वृत्रहा) अन्धकारनाशकः (अन्तरिक्षम्) आकाशम् (वि अतिरः) तॄ तरणे-लङ्, अदादित्वम्। विस्तारितवानसि (उत्) उत्तमतया (द्याम्) द्योतमानं सूर्यम् (अस्तभ्नाः) स्तम्भितवानसि (ओजसा) पराक्रमेण ॥