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ज॑ज्ञा॒नः सोमं॒ सह॑से पपाथ॒ प्र ते॑ मा॒ता म॑हि॒मान॑मुवाच। एन्द्र॑ पप्राथो॒र्वन्तरि॑क्षं यु॒धा दे॒वेभ्यो॒ वरि॑वश्चकर्थ ॥

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Pad Path

जज्ञान: । सोमम् । सहसे । पपाथ । प्र । ते । माता । महिमानम् । उवाच ॥ आ । इन्द्र । पप्राथ । उरु । अन्तरिक्षम् । युधा । देवेभ्य: । वरिव: । चकर्थ ॥८७.३॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:87» Paryayah:0» Mantra:3


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

पुरुषार्थी के लक्षण का उपदेश।

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले मनुष्य] (जज्ञानः) उत्पन्न होते हुए तूने (सोमम्) सोम [तत्त्व रस] को (सहसे) बल के लिये (पपाथ) पान किया है और (ते) तेरी (माता) ने [तेरे] (महिमानम्) महत्त्व को (प्र) अच्छे प्रकार (उवाच) कहा है। तूने (उरु) विशाल (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को (आ) सब ओर से (पप्राथ) भर दिया और (युधा) युद्ध से (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (वरिवः) सेवनीय धन (चकर्थ) उत्पन्न किया है ॥३॥
Connotation: - पहिले ही पहिले माता उत्तम शिक्षा से मनुष्य में उत्तम संस्कार उत्पन्न करे, तब वह मनुष्य विद्वान् बलवान् और धनवान् होकर संसार में कीर्ति पाता है ॥३॥
Footnote: ३−(जज्ञानः) जायमानः (सोमम्) तत्त्वरसम् (सहसे) बलाय (पपाथ) पा पाने रक्षणे च-लिट्। पीतवानसि (प्र) प्रकर्षेण (ते) तव (माता) माननीया जननी (महिमानम्) तव भाविमहत्त्वम् (उवाच) कथयामास (आ) समन्तात् (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् मनुष्य (पप्राथ) प्रा पूरणे-लिट्। पूरितवानसि (उरु) विस्तृतम् (अन्तरिक्षम्) अवकाशम् (युधा) युद्धेन (देवेभ्यः) विद्वद्भ्यः (वरिवः) अ० २०।११।७। वरणीयं धनम् (चकर्थ) कृतवानसि ॥