PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमेश्वर] (अस्मे) हमको (गोमत्) बहुत भूमिवाला, (वाजवत्) बहुत अन्नवाला, (पृथु) फैला हुआ, (बृहत्) बढ़ता हुआ, (विश्वायुः) पूरे जीवन तक रहनेवाला, (अक्षितम्) अक्षय [न घटनेवाला] (श्रवः) सुनने योग्य यश वा धन (सम्) अच्छे प्रकार (धेहि) दे ॥१३॥
Connotation: - मनुष्यों को चाहिये कि परमात्मा की भक्ति के साथ ब्रह्मचर्य से विद्या प्राप्त करें और बहुत यश और धन पाकर चक्रवर्त्ती राजा होकर संसार को सुख दें और आप सुखी होवें ॥१३॥
Footnote: १३−(सम्) सम्यक् (गोमत्) बहुभूमियुक्तम् (इन्द्र) परमेश्वर (वाजवत्) बह्वन्नवत् (अस्मे) अस्मभ्यम् (पृथु) विस्तृतम् (श्रवः) श्रवणीयं यशो धनं वा (बृहत्) वर्धमानम् (विश्वायुः) सर्वजीवनपर्याप्तम् (धेहि) देहि (अक्षितम्) अक्षीणम्। हानिरहितम् ॥
