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वेत्था॒ हि निरृ॑तीनां॒ वज्र॑हस्त परि॒वृज॑म्। अह॑रहः शु॒न्ध्युः प॑रि॒पदा॑मिव ॥

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वेत्थ । हि । नि:ऽऋतीनाम् । वज्रऽहस्त ।‍ परिऽवृजम् ॥ अह:ऽअह: । शुन्ध्यु: । परिपदाम्ऽइव ॥६६.३॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:66» Paryayah:0» Mantra:3


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

ऐश्वर्यवान् पुरुष के लक्षणों का उपदेश।

Word-Meaning: - (वज्रहस्त) हे वज्र हाथ में रखनेवाले ! (हि) निश्चय करके (परिपदाम्) विपत्तियों के (शुन्ध्युः इव) शोधनेवाले के समान (अहरहः) दिन-दिन (निर्ऋतीनाम्) महाविपत्तियों के (परिवृजम्) रोकने को (वेत्थ) तू जानता है ॥३॥
Connotation: - जो मनुष्य शूर पराक्रमियों के समान विघ्नों को हटाकर प्रजा की रक्षा करे, उसका सब लोग आदर करें ॥३॥
Footnote: इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ३−(वेत्था) सांहितिको दीर्घः। वेत्सि। जानासि (हि) एव (निर्ऋतीनाम्) अ० २।१०।१। कृच्छ्रापत्तीनाम् निरु० २।७। (वज्रहस्त) हे वज्रपाणे (परिवृजम्) वृजी वर्जने-घञर्थे क। परिवर्जनम्। निवारणम् (अहरहः) प्रतिदिनम् (शुन्ध्युः) अ० २०।१७।१। शोधकः (परिपदाम्) विपदाम्। विपत्तीनाम् (इव) यथा ॥