Reads 60 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
परमात्मा के गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (अध्वर्यो) हे हिंसा न चाहनेवाले पुरुष ! (मध्वः) ज्ञान [मधुविद्या] के (वा) और (अन्धसः) अन्न के (मदिन्तरम्) अधिक आनन्द देनेवाले रस को (इत् उ) अवश्य ही (आ) सब ओर (सिञ्च) सींच, (सदावृधः) सदा बढ़ानेवाला (वीरः) वीर (एव) इस प्रकार (हि) ही (स्तवते) स्तुति किया जाता है ॥४॥
Connotation: - विद्वान् पुरुष हिंसा कर्म छोड़कर विद्या और अन्न आदि की प्राप्ति के तत्त्वसिद्धान्तों का प्रकाश करके वीरों के समान कीर्ति पावे ॥४॥
Footnote: मन्त्र ४-६ ऋग्वेद में हैं-८।२४।१६-१८, कुछ भेद से सामवेद-उ० ८।२। तृच १०, मन्त्र ४-साम०-पू० ४।१०। ॥ ४−(आ) समन्तात् (इत्) अवश्यम् (उ) अवधारणे (मध्वः) मधुनः। निश्चितज्ञानस्य (मदिन्तरम्) नाद् घस्य। पा० ८।२।१७। इति तरपो नुडागमः। मादयितृतरं रसम् (सिञ्च) सिक्तं कुरु (वा) चार्थे (अध्वर्यो) अ० १८।४।१। हे अहिंसामिच्छुक (एव) एवम् (हि) निश्चयेन (वीरः) शूरः (स्तवते) स्तूयते (सदावृधः) सर्वदा वर्धयिता ॥
